Spread the love पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति में संभावित बाधाओं के बीच सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती का निर्णय लिया है। इस कदम का उद्देश्य उपभोक्ताओं और तेल कंपनियों को बढ़ती कीमतों के दबाव से राहत देना है, हालांकि इसका असर तुरंत दिखेगा या नहीं, यह ईंधन मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। एक्साइज ड्यूटी में कितना हुआ बदलाव? सरकार ने पेट्रोल और डीजल दोनों पर ₹10 प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी घटाई है। इसके बाद पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी लगभग ₹3 प्रति लीटर रह गई है, जबकि डीजल पर यह प्रभावी रूप से शून्य के करीब पहुंच गई है। यह कदम तेल विपणन कंपनियों (OMCs) पर बढ़ते वैश्विक कच्चे तेल के दामों के असर को कम करने के लिए उठाया गया है। इसे भी पढ़े: लॉकडाउन पर बड़ा सवाल: क्या है असली सच्चाई? वैश्विक तनाव बना प्रमुख कारण यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है। साथ ही, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में आपूर्ति बाधित होने की आशंका भी बनी हुई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत वहन करता है, जहां से प्रतिदिन करीब 20–25 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता है। भारत के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी कुल तेल आयात का लगभग 12–15 प्रतिशत इसी मार्ग से प्राप्त करता है। ऐसे में किसी भी प्रकार की बाधा से कीमतों में वृद्धि और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। क्या तुरंत घटेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें? एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तुरंत गिरावट की संभावना कम है। भारत में तेल कंपनियां अक्सर अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को खुद वहन करती हैं, ताकि बार-बार कीमतों में बदलाव न करना पड़े। ऐसे में यह कटौती शुरुआती तौर पर कंपनियों के नुकसान की भरपाई में मदद कर सकती है, जबकि उपभोक्ताओं को राहत धीरे-धीरे मिलने की संभावना है। कैसे तय होती है ईंधन की कीमत? भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत कई चरणों से गुजरकर तय होती है। देश अपनी लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात करता है, जिससे डॉलर-रुपया विनिमय दर का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। कच्चे तेल की प्रति लीटर लागत आमतौर पर ₹35 से ₹45 के बीच होती है। इसके बाद रिफाइनिंग, फ्रेट और बीमा जैसे खर्च जुड़ते हैं, जो ₹3–5 प्रति लीटर तक होते हैं। इसके अलावा, तेल कंपनियों का मार्जिन (₹2–3), केंद्र की एक्साइज ड्यूटी, डीलर कमीशन (₹3–4) और राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला वैट (VAT) भी अंतिम कीमत में शामिल होता है। ईंधन की कीमत में टैक्स का कितना हिस्सा? पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत में टैक्स का बड़ा हिस्सा होता है। एक्साइज ड्यूटी कटौती से पहले केंद्र सरकार का कर लगभग ₹19–20 प्रति लीटर (पेट्रोल) और ₹15–16 प्रति लीटर (डीजल) था, जो कुल कीमत का करीब 20–25 प्रतिशत हिस्सा बनता है। वहीं, राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला वैट 20–30 प्रतिशत तक होता है। कुल मिलाकर, उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत का लगभग 40–55 प्रतिशत हिस्सा केवल टैक्स होता है। कीमतों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक भारत में ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं, जिनमें वैश्विक कच्चे तेल के दाम, डॉलर-रुपया विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत और केंद्र व राज्य सरकारों की कर नीतियां शामिल हैं। इन कारकों में बदलाव से कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है। अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ता है असर? ईंधन पर लगने वाला टैक्स केंद्र और राज्य सरकारों के लिए राजस्व का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में करों में कटौती से सरकारी आय पर असर पड़ सकता है। वहीं, ईंधन की कीमतों का सीधा प्रभाव महंगाई, परिवहन लागत और आम लोगों के खर्च पर पड़ता है। क्या संकेत देती है यह कटौती? एक्साइज ड्यूटी में हालिया कटौती से यह संकेत मिलता है कि सरकार वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच महंगाई को नियंत्रित करने और तेल कंपनियों को राहत देने के लिए हस्तक्षेप कर रही है। हालांकि, इससे राजकोषीय संतुलन पर दबाव पड़ने की भी संभावना है। Source: https://www.business-standard.com/economy/news/why-india-cut-fuel-excise-duty-now-petrol-prices-impact-iran-us-israel-war-126032700284_1.html Post navigation लॉकडाउन पर बड़ा सवाल: क्या है असली सच्चाई? RCB IPL 2026 Schedule OUT! कब और किससे भिड़ेगी चैंपियन टीम?