अब उत्तराखंड में भी दो राजधानियां,गैरसैंण बनी उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी

Spread the love

उत्तराखंड बजट सत्र के दौरान सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक बड़ी घोषणा कर दी। लंबे समय से चले आ रहे कयासों के बीच सीएम ने गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया।

सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक ही मास्टर स्ट्रोक से विपक्ष को चारो खाने चित कर दिया। इस घोषणा के साथ ही प्रदेश में अब दो राजधानियां हो जाएंगी, लेकिन स्थायी राजधानी की पहेली बनी रहेगी।

सीएम के इस कार्ड की भनक सरकार ने भराड़ीसैंण में पहुंचे विपक्ष को और अन्य आंदोलनकारी संगठनों तक को नहीं लगने दी। बीते दिनों ही कैबिनेट में इस पर चर्चा हुई थी, लेकिन मंत्रियों को साफ हिदायत दे दी गई थी कि किसी को इसकी भनक नहीं लगने दी जाए। सदन में घोषणा होने के साथ ही गैरसैंण में जश्न का माहौल शुरू हो गया। सत्ता पक्ष के विधायक लोगों से फूल मालाएं स्वीकार करते हुए दिखाई दिए।

यह भी पढ़े - आगरा के एक परिवार के 6 सदस्यों में कोरोना वायरस की पुष्टि, PM बोले – ‘घबराने की जरूरत नहीं’

समर कैपिटल की घोषणा पर सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को मिठाई खिलाते विधानसभा अध्यक्ष

 

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैंण को समर कैपिटल बनाए जाने को राज्य आंदोलनकारियों और प्रदेश की माताओं-बहनों को समर्पित किया। मुख्यमंत्री ने भावुक होते हुए कहा, ‘यह गर्व का पल है। यह एक बहुत बड़ा फैसला है। मैं रात भर सो नहीं पाया और काफी सोच-विचार कर यह फैसला किया है। हमने 2017 के घोषणा पत्र में किए गए वायदे को पूरा किया है।’

लेफ्ट ने कहा- दो राजधानियां अंग्रेजों की सोच

इंद्रेश मैखुरी ने कहा, ‘ग्रीष्मकालीन-शीतकालीन का खेल गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को हाशिए पर डालने की त्रिवेंद्र रावत सरकार की साजिश है। 50 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में डूबे हुए 13 जिलों के छोटे से प्रदेश में दो राजधानियां औचित्यहीन और जनता के धन की बर्बादी हैं। दो राजधानियां औपनिवेशिक अवधारणा है, जिसे हिंदुस्तान पर राज करने आए अंग्रेजों ने अपने ऐशो-आराम के लिए ईजाद किया था।’

वहीं, विपक्षी कांग्रेस के चार वरिष्ठ नेताओं विजय सारस्वत, धीरेंद्र प्रताप उपाध्यक्ष और विशेष आमंत्रित सदस्य सीए राजेश्वर पैन्यूली और पूर्व मंत्री अजय सिंह ने गैरसैंण को समर कैपिटल बनाए जाने को शहीदों का अपमान बताया है।

 

पहली बार साठ के दशक में उठी थी गैरसैंण राजधानी की मांग

 गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग साठ के दशक में पहली बार उठी थी। इस मांग को उठाने वाले कोई और नहीं, बल्कि पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली थे। यही वजह रही कि उत्तराखंड क्रांति दल ने उस दौर में गैरसैंण को गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर रखा था।

उत्तरप्रदेश से एक अलग राज्य उत्तराखंड बनाने के साथ ही उसकी राजधानी गैरसैंण को बनाने की मांग उठने लगी थी। राज्य आंदोलनकारियों और उत्तराखंड क्रांति दल ने समय-समय पर इसकी मांग के लिए आंदोलन तेज किया। उनका अलग राज्य गठन का ये संघर्ष 9 नवंबर 2000 को खत्म हुआ और उत्तराखंड को राज्य का दर्जा मिला। हालांकि फिर उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण न होकर देहरादून(अस्थाई) बन गई। इसको लेकर फिर से आंदोलन शुरू हुए और राज्य आंदोलनकारियों ने ‘पहाड़ी प्रदेश की राजधानी पहाड़ हो’ का नारा बुलंद किया। इसलिए गैरसैण को जनभावनाओं की राजधानी भी कहा जाने लगा।