भारत में कोरोना का विशेष प्रभाव

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Blog by: Akshay Sharma

आज भारत में महामारी से 9000 हजार से ज्यादा लोग पीड़ित है। जिसमॆं से करीब 1000 लोग ठिक हो गए परंतु 240 से ज्यादा लोग अपनी जान खो चुके है। निश्चित ही इसमें दुर्भाग्यपूर्ण योगदान निजामुद्दीन की मस्जिद से निकली धार्मिक भीड का है। ऐसे में भारतीय समाज का एक बडा हिस्सा जो धार्मिक कट्टरवाद से ग्रस्त है। यह कट्टरवाद समाज ऐसी स्थिति मॆं नई परेशानियां खडा कर रहा है।

बजाय समूह की करतूतों का खंडन करने के, बजाय कानून को तोडने की आलोचना करने के, बजाय समूह में होने की बात को दोहराने के, बजाय अशिक्षा पर प्रहार करने के, नए भारत का दावा करने वाला हमारे देश में कई बहुसंख्यक लोग अपनी घटिया मानसिकता का परिचय देते हुए एक विशेष धर्म पर प्रहार कर रहा है। बात सिर्फ जमात की नहीं है कर्नाटक में भाजपा विधायक एम जयराम ने अपना जन्मदिन ऐसे मनाया जैसे लाकडाउन औऱ कोरोना जैसी कोई चीज है ही नहीं। इसमें भी बडी संख्या मे लोगो के जुटने की बात सामने आ रही है।

ऐसा होना स्वभाविक तब हो जाता है। जब समाज में अत्यधिक जानकारी देने वाले बडे टीवी चैनल ही हीन भावना से ग्रस्त हो। 6 अप्रेैल निजामुद्दिन स्थित मस्जिद प्रशासन ने तो कुछ मीडिया कंपनीयों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक रंग देने के खिलाफ याचिका भी दी है। जमात में लगभग दो हजार से ज्यादा लोग थे।

साथ ही इसमें भी कोई दो राय नहीं की कडी कारवाई होना एकदम सही निर्णय था। लेकिन सोशल मीडिया पर झूठे भ्रम और अफवाहे बेहद सक्रिय है।

बहुत तेजी से सकारात्मक रिपोर्टिंग करने वाली मीडिया उनका भांडा फोड भी कर रही है। इंडिया टुडे की वैबसाइट ने यह दावा किया है की नोटो पर थूक लगाने वाला प्रकरण पूर्ण रुप से गलत अथवा धर्म विशेष को बदनाम करने की साजिश है। इसके अलावा सब्जी वालो को लेकर भी नए-नए झूठ और भ्रम फैलाए जा रहे है।

कोरोना का धार्मिक मोड़

उर्दू साहत्यिक के बडे दिग्गज और सदी के बडे शायर मुन्नवर राणा ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा :-

जो भी ये सुनता है हैरान हुआ जाता है,
अब कोरोना भी मुसलमान हुआ जाता है।

लाकडाउन जैसे कडे कदम की सरहाना भारत को समस्त विश्व से मिल रही है। 11 अप्रैल को भारत सरकार की ओर से बताया गया की अगर यह कडा कदम नहीं उठाया गया होता तो अबतक बिमारी से प्रभावित लोगों की संख्या आठ लाख तक हो सकती थी।

इससे ऊपर यह भी है कि क्या महामारी के बीच धार्मिक रंग पैदा करना शर्मिंदगी महसूस कराता है। जमात ऐसा शब्द हो गया मानो कि इसका सीधा तात्पर्य बिमारी फैलाने की मशीन हो। मगर यह होना और भी लाजमी हो जाता है जब जमात से निकले लोग कुतर्को और पहचान छुपाने को लेकर सक्रिय हो जाते है।

भारत में भारतीय को नियंत्रण करने के लिए विभिन्न कदम उठाए जा रहे है। पुलिस ने किसी भी थूकने वाले पर जरुरी धारा लगा मुकद्मा दर्ज करना शुरु कर दिया है। इसमें कड़ा और सराहनीय कदम यह भी धारा में 307 अथार्त हत्या करने का प्रयत्न। यदि किसी की मौत हो जाए तो यह धारा 302 के तहत हत्या का मामला बिना किसी संकोच के दर्ज किया जाएगा।

मगर कानून कब तक समाज को इन उपद्रवियों से बचाएगा औऱ हम कब तक धर्म में कट्टरता महसूस करते रहेगें। भारत जैसी विविधताओं वाला देश स्वंय को परिपक्व करने में कितना समय लगाएगा।

क्या चुनौतियाँ कभी इससे आगे निकल कर महामारी की लडाई को औऱ तेज करने की हो पाएगी। क्या जमात का अर्थ सिर्फ मूर्खता पूर्ण भीड ही होगा या इसे हमेशा कुछ लोग धार्मिक हमले की प्रवति कायम रखने वाले है। बहरहाल कोरोना को लेकर सरकार के सराहनीय कदमों पर ध्यान दें। पुलिस व्यवस्था औऱ स्वास्थ्यकर्मियों की जमात को सलाम करते रहें।
घर में अपनो के साथ समय बिताने को समझदारी समझे।

Disclaimer (अस्वीकरण)- इस आलेख में प्रस्तुत किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना, संपूर्णता, सटीकता और सत्यता के लिए talk2india उत्तरदायी नहीं है।