पंजाब : फिल्म, समाज और अपराध

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कहते है कि फिल्में समाज का आइना होती हैं। अकसर फिल्मों में वो ही दिखाया जाता है जो समाज में घटित हो रहा है। फिल्मों का हमारे समाज पर बहुत प्रभाव पड़ता है। ये प्रभाव सकरात्मक और नकरात्मक दोनों तरह के हो सकते है। पर कुछ फिल्मों को रिलीज़ होने से पहले ही बैन दिया जाता है। हालांकि कुछ फिल्मों को कोर्ट की इज़ाज़त के बाद रिलीज़ भी कर दिया जाता हैं। इसी श्रृंखला में पंजाब के मशहूर शार्प शूटर “सुक्खा काहलवां” के जीवन पर आधारित फिल्म “शूटर” पर रिलीज़ होने से पहले ही पंजाब सरकार ने बैन लगा दिया। हालांकि फिल्म के निर्माता ने प्रतिबंध को गैरक़ानूनी बताया है और इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी है। अब देखना यह होगा कि कोर्ट का क्या फैसला आता है और यह फिल्म कब दर्शको को देखने को मिलती हैं।

कौन है शार्प शूटर सुक्खा काहलवां?

सुखवीर सिंह उर्फ सुक्खा काहलवां का जन्म जालंधर-अमृतसर हाईवे के गांव ‘काहलवां’ में 21 जून 1987 को एक आम जमींदार घर में हुआ। सुखवीर एक आम लड़का था जिसका सपना विदेश जाने का था। 2004 में उसके माता पिता का अमेरिका का वीजा लग गया पर किस्मत ने सुखवीर का साथ नहीं दिया। एक लड़ाई की वजह से पासपोर्ट नहीं बन पाया। माता पिता ने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए दिल पर पत्थर रख कर अमेरिका जाने का फैसला किया। एक 17 वर्ष की कच्ची उम्र में अपने सपने को टूटता हुआ देखने के बाद सुक्खा ने आगे बढ़ने का फैसला कर लिया। लेकिन उसके बाद उसके सपने भी बदल गए।

नशे से दूर रहने वाला सुखवीर बाहर लड़ाई का पर्याय बन गया। सुखवीर से गैंगस्टर शार्प शूटर सुक्खा काहलवां बनने के सफर की शुरुआत हो गई। उसके ज़िंदगी में जल्द ही चीज़े बदल गई। छोटी लड़ाईया, झडपे, गैंगवार्स में होने लगीं। गुरुघर जाने वाले लड़के के हाथो में हथियार दिखने लगे तो सड़को पर हथियार लहराए जाने लगे। बहुत सी गैंगवार और लड़ाइयों में शामिल होने के कारण उस पर हत्या, मारपीट के मुक़दमे चल पड़े। जिसके कारण उसकी कई पॉलिटिकल नेताओ और गैंगस्टर्स से दुश्मनी हो गई। 21 जनवरी 2015 की शाम 27 साल के गैंगस्टर सुक्खा कहलवां की कोर्ट से पेशी के बाद जेल लौटते समय के पुलिस कस्टडी में ही अज्ञात लोगो ने 40-50 बुलेट फायर कर मौत के घाट उतर दिया। हालांकि उसके ही कुछ पुराने दोस्त से दुश्मन बने बदमाशो ने हत्या की जिम्मेदारी ली। पंजाब में आज भी लड़के सुक्खा काहलवां को अपना आदर्श मानते हैं।

गैंगस्टर सुक्खा काहलवां जैसे युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जो जल्द ही जुर्म के रास्ते पर निकल पड़ते हैं। इतना जानने के बाद मेरे जहन में कुछ सवाल खड़े हो गए हैं।

१. क्यों युवा जुर्म के प्रति आकर्षित हो रहे हैं ?
२. क्या आज का युवा मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है, जो गलत और सही में फर्क नहीं कर पा रहा?
३. कौन सी वजह है जिसके कारण इस राह पर युवा चल पड़े है?
४. पुलिस कस्टडी में गैंगस्टर सुक्खा कहलवां को अज्ञात बदमाश हत्या करते हैं और बेखौफ होकर लाश के सामने भंगड़ा करते है। ऐसे में पुलिस पर भी सवाल खड़े होते है।

गैंगस्टर बनने की राह पर चल पड़े हैं युवा?

पंजाब शब्द पंज+आब से मिलकर बना है जिसका अर्थ है पाँच नदियों का प्रदेश। पंजाब की धरती वीरो की धरती है। इसकी संस्कृति, सभ्यता और इतिहास बहुत विशाल और शानदार है। आजादी की लड़ाई में बड़ा रोल अदा करने के बाद पंजाब देश के विकास में भी अहम योगदान दे रहा है। यहाँ के किसानों ने मेहनत और लगन से देश को बहुत सहयोग दिया। साथ ही औद्योगिक विकास के लिए भी पंजाब लगातार प्रयासरत है। परन्तु इन सभी उपलब्धि के बाद हमे आज देखने को मिल रहा है, जहां समाज के युवा गलत मार्ग को चुनने को विविश हो रहे है. फिर वही सवाल कि …… क्यों ?

१.पंजाब में बढ़ता नशा : पंजाब एक समृद्ध प्रदेश होने के बावजूद कुछ समसस्याओ से भी जूझ रहा है। राज्य के युवा अफीम, हेरोइन जैसे नशे के शिकार होते जा रहे है। नशा करने वाला व्यक्ति आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर होने लगता है। यह एक बड़ा कारण है जो इन ज्यादातर युवाओं को गलत रास्ते पर चलने को मजबूर करता है। जब एक व्यक्ति सही या गलत को समझने में असमर्थ हो जाये तो जुर्म के दलदल में फंस जाता है। ऐसा दलदल जिसके जाने के रास्ते तो खुले है पर वापिस आना नामुकिन सा हो जाता है।
२.कानून व्यवस्था : आज हमारे प्रशासन में कई बड़े और छोटे अफसर है. जो अपराधियों से घूंस लेते है। जिसके कारण छोटे अपराध करने के वाले अपराधी बड़े अपराध करने लगते है। कानून का डर लगातार कम होता जा रहा है। इसे रोकने के लिए कानून व्यवस्था में कुछ सुधार की जरूरत है। ऐसा होने से अपराध कुछ हद तक रोका जा सकता है।
३.नेताओ का संरक्षण : पंजाब में अपराध बढ़ने का एक वजह पुलिस और नेताओ का संरक्षण प्राप्त होना है। लगभग हर अपराधी का किसी न किसी नेता का साथ देखने को मिलता है। उन्ही के सेह पर अपराधी कोई बड़ा जुर्म करने से नहीं डरते।
४. पावर प्ले और कम्पटीशन : समाज में कम्पटीशन बढ़ता ही जा रहा है है। आगे निकलने की दौड़ में लोग तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। फिर चाहे वह गलत ही क्यों न हो। और एक बार जिसको हथियारों के बल पर शोहरत व पैसा मिलने लगे तो आपस में ही वर्चस्व की लड़ाई बढ़ जाती है।
५.मानसिक कमजोरी : हम सब जानते है कि हम सबका विकास बन्दरों की प्रजाति से हुआ हैं। इनकी जिंदगी चुनौतियों से भरी हुई थी। खाने, रहने और अपने सुरक्षा के लिए लड़ना पड़ता था। यही हमारी सच्चाई है। कम्पीटीशन में जीतने के लिए हमारे पूर्वज शक्तिशाली और आक्रमक थे। उसी हिसाब से हमारा दिमाग विकसित हुआ। परन्तु जो इंसान गुस्सा, लालच, आक्रमक और अहंकार जैसे भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाते, वो सही मार्ग को छोड़ गलत मार्ग की ओर बढ़ने लगते है।
६.पैसों की चमक : आज हमारा सारा समाज आराम और विलासिता के साथ जिंदगी जीना चाहता है। इसके लिए पैसे चाहिए। पैसे पाने के लिए कुछ लोग अपराध करना आसान समझते है। वही कुछ सिस्टम से तंग आकर भी यह रास्ता अपना लेते है। कुछ और वजह भी हो सकती है।

यह कुछ फैक्टर्स को लिखने की कोशिश जरूर की है। लेकिन यह पूर्ण नहीं है। अगर फिल्म की बात करे तो पंजाब सरकार ने फिल्म में हिंसा और गन कल्चर को बढ़ावा देने का हवाला देकर फिल्म को बैन कर दिया है। लेकिन फिल्म को बैन करने को लेकर कुछ लोग सहमत नहीं है। वहीं कुछ लोग बैन का समर्थन भी कर रहे है। सबका नजरिया अलग है और हम इसके लिए किसी को सही या गलत नहीं साबित नहीं कर सकते। वैसे देखा जाये तो किसी गैंगस्टर, बदमाश या हिंसा दर्शाती फिल्में हमेशा से बनती आई हैं। यह कोई पहली ऐसी फिल्म नहीं है। पंजाबी सिनेमा में कुछ समय पहले फिल्म रुपिंदर गाँधी १ और २ रिलीज़ हुए और बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुए। समय समय पर बदलाव होता है और आज हमारी पीढ़ी सच्ची कहानी पर आधारित फिल्में देखना ज्यादा पसन्द करने लगी हैं। इसमें गलत भी क्या है? कुछ लोगों का मानना है ऐसी फिल्में रिलीज़ होने चाहिए क्यूंकि समाज को पता चलता है कि यह जीवन आसान नहीं होता। सब छूट जाता है कि कैसे इसकी शुरुआत चमक के साथ होती है पर यह सब बाद में कैसे जरूरत और फिर मज़बूरी में बदल जाती है। अंत हमेशा हैप्पी नहीं होता। इसके साथ ही फिल्म निर्माता को ऐसे फिल्मों को बनाते समय बहुत सी चीज़ो का भी ध्यान रखना चाहिए। ताकि दर्शाक सच्चाई से भी रूबरू हो सके। प्रायः एक निर्माता फिल्म में अच्छे और बुरे दोनों पहलू को दर्शाने की कोशिश करता है। यह तो हमारी व्यक्तिगत मानसिकता है। हमें कोन सा पहलू आकर्षित करता है। क्योंकि हर फिल्म एक संदेश जरूर देती है।

विवेकानन्द जी ने कहा था – ”संसार की प्रत्येक चीज अच्छी है, पवित्र है और सुन्दर है यदि आपको कुछ बुरा दिखाई देता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह चीज बुरी है। इसका अर्थ यह है कि आपने उसे सही रोशनी में नहीं देखा।”

Blog by : Beena

Disclaimer (अस्वीकरण)- इस आलेख में प्रस्तुत किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना, संपूर्णता, सटीकता और सत्यता के लिए talk2india उत्तरदायी नहीं है।