लिखास, छपास और स्वतंत्रता

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Akshay sharma's blog

Blog by – Akshay Sharma

क्या स्वतंत्रता पत्रकारिता जगत में एक आदर्शवाद। जैसे को तैसा लिखना एक सामाजिक खिलाफत के दायरे में आने लगता है। देश के महशूर शायर राहत इंदौरी का एक शेर है:-

एक अखबार हूँ अखबार

औकात ही क्या मेरी,

मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ।

मेरी निजी मान्यता में तो एक दार्शनिक से ज्यादा स्वतंत्रता का आनंद कोई नहीं ले सकता। बहरहाल, बात अखबारों की हो तो देश का पहला अखबार बंगाल गजट भी संपादक के निजी विचारों का गुलाम एंव कथाकथित शब्द प्रोपोगैडा से युक्त था। कई कानून आए और गए। इनके आने जाने में भी कुछ पत्रकारों, वकीलों और तथाकथित सामाजिक मनुष्यो ने अपनी बौद्धिक्ता का प्रमाण देते हुए इसका शोषण भी किया।

भारत अपनी स्वतंत्र पत्रकारिता में आज 180 देशों मे 142वें पायदान पर है। यूपीए की सरकार में भी आँकाडा इसे के आस-पसा रहा है। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 19 के तहत विचारों की स्वतंत्रता है। मगर ये आज कहना मुश्किल है की देश में पत्रकारिता के आयाम कितने गिर गए है। चौथा स्तंभ कहने भर ही रह गया है।

मीडिया का मुख्य काम सत्य दर्शन करना एंव कराना है। इसके साथ ही सामाजिक न्याय, समानता के लिए कार्य भी इसी के अंतर्गत आते है। भारत में इन दिनो कुछ पत्रकार अपने धंधे से बलात्कार कर रहे है। इसमें वह सभी शामिल हो जाते है जो सरकारो की नीति और नियति पर शक करने की बजाय। व्यक्तित्व की महिमांडन में मुरीद है।

देश में बडा घोटाला सन् 2019 में किया गया फ्रांस से राफेल विमान खरीदने के साथ अभी तक सामने आया है। इसमें सीधे-सीधे सरकारों को घेरने की बजाय पत्रकारों ने सत्ता समर्थन के साथ ही अपना भ्रष्टाचार प्रेम भी स्पष्ट किया। ऐसे मे पत्रकारिता धर्म का पालन करने का जिम्मा देश के बडे सम्पादक एन राम ने अपनी पुस्तक में किया जो की राफेल के घोटले पर आधारित थी। इसके साथ  ही इंडियन एक्सप्रैस, टाइम्स आफ इंडिया औऱ द हिंदू के 2019 के चुनाव के बाद सरकारी इश्तेहार मिलने मे समस्याएँ आने लगी। इस धटना को साझा करने का एक कारण यह भी है की सरकारें स्वतंत्रता को विचार नहीं अपितु सूचना पर नियंत्रण के लिए ज्यादा सोचती है।  इसके कई उदाहरण हमें देखने को दुनिया भर में मिल जाते है। उत्तरप्रदेश में सहारनपुर जिले के रहने वाले गुप्ता बंधुओं ने 90 के दशक में व्यापार के लिए साउथ अफ्रीक गए औऱ वहाँ जाकर लंबे समय तक सत्ता पर आसिन जैकब जुमा के लिए प प्रोपगेंडा करना शुरु कर दिया। आज वक्त और सरकार बदलते ही स्वदेश लौट आए है।

इन दिनो में समझा जाए तो चीन का मीडिया दुनिया भर में एक भ्रष्ट तंत्र का उदाहरण है। उग्र राष्ट्रवाद और अपनी राजनीति के चलते अमेरीकि राष्ट्रपति का मीडिया से संवाद। विचारों की स्वतंत्रता बहुत कम ही देखने को मिलती है।

ऐसे में हमें यह समझना होगा की कैसे पत्रकारिता विकास की आत्मा है साथ ही रचनात्मक आलोचना जैसे प्रगतिशील विचार व्यहवार में बने रहे।

Disclaimer (अस्वीकरण)- इस आलेख में प्रस्तुत किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना, संपूर्णता, सटीकता और सत्यता के लिए talk2india उत्तरदायी नहीं है।