वसुंधरा पर प्राणी

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Akshay sharma's blog

Blog by – Akshay Sharma

क्या लिखा जाए शर्म की बात ही तो है। सोचिए आदमी अपने रिश्तो में वफा की कितनी कसमें खाता है। जिस धरती पर रहता है उससे बेवफाई समझना ही नहीं चाहता। एक पुरानी कहावत है बिना लडाई पढाई किसी काम की नहीं। किताबों मे जो लिखा जाता है यदि धरातल पर उतर जाए तो जेएनयू जैसे दिग्गज संस्थान भी दुनिया की नजरों में अलग नजरिए से पेश होने लगते है। जेएनयू लिखना इसलिए जरूरी है क्योकि पाँच दशक पहले भी अमेरीका ने भी कैलिफोर्नियाँ के छात्रो ने आंदोलन किया। छुट्टी का दिन था। 22 अप्रैल की तारीख थी। तो इतिहास में इसे अर्थ डे के नाम से जाना जाने लगा। बात अमरीका की है। विकसीत राष्ट्र की छवि वाला ये मूल्क अपनी किताबो और आंदोलनो से प्रकति के लिए लडना शुरु कर चुका था।

इस वर्ष अर्थ डे की थीम है क्लार्ईमेंट एक्शन। इससे दुनिया भर में यह संदेश दिया जा रहा है की ज्यादा से ज्यादा ऐसे तरीको औऱ कार्य़प्रणाली का प्रयोग हो जिससे खेती और जमीन से जुडी समस्याएँ कम से कम हो। एकश्न शब्द का प्रयोग मुख्य रुप से सन् 2030 तक की सीमा के अंदर व्यहवारिक परिणाम की उम्मीद दुनिया भर के पर्यावरण संरक्षक औऱ संस्थाएँ कर रही है। इसमें मुख्य रुप से तीस प्रतीशत तक सुधार की उम्मीद की जा रही है।

साथ ही दुनिया भर इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है की किस तरह ज्यादा से ज्यादा जनसंख्या को पर्यावरण के प्रति जागरुक किया जाए। वातावरण में धरती को हम हानि दे रहे है इसका ज्ञान निरंतर लोगो के मस्तिष्क में बिठाना होगा।

Earth day

कोरोना के चलते आज यह साफ है की दुनिया भर में हर प्रकार का प्रदूषण गायब हो गया। सन् 1970 के बाद मानव जाति ने आँकडे जमा करने शुरु कर दिए है। इसमें हर तरह से हमने स्वंय को ही धक्का दिया है। भूस्खलन, सूखा, बाढ औऱ समुद्री उठा पटक सीधे-सीधे दोगुनी हो गई है। लगभग चालीस लाख से ज्यादा लोग हर साल केवल वायु प्रदूषण से ही मर जाता है। जल प्रदूषण ऐसा कर दिया है की अठाराहा लाख लोग हर बाराह महिने में मरते ही है। 10 करोड का सीधा आँकडा जीव-जंतु औऱ मनुष्यो की जान लेने का हर प्रदूषण को मिलाकर है। ध्वनि प्रदूषण ने जो हाल किया है उसे मनुष्य बुद्धि पर जो तनाव एँव वातावरण में पशु-पक्षियों पर अत्याधिक पर नराकातम्क प्रभाव पडा है।

ऐसे में ग्रेटा थैनबर्ग जैसे लोगो का नाम तो आता है। मगर नाम ही रह जाता है। चीन और अमेरीका जैसे देश कागज पर अक्सर झूठी कसमें खाते रहते है की हम कार्बन उत्सर्जन कम करेंगे। चाईना, अमेरीका, भारत, जापान और रुस जैसे देश प्रदूषण में सबसे आगे है। इसमें पहले चीन और दूसरे नंबर पर अमेरीका है। कारखानें में उत्पाद से धन हासिल करने की प्रवति इन देशो को आर्थिक रुप से मजबूत जरुर करती है। धरती की प्राकुतिक संसाधनो का शोषण भी सबसे ज्यादा इन्ही देशो ने किया है। इसमें सारा इल्जाम मनुष्य के अपने बाँटे हुए देशो अथवा राष्ट्रो की पहचान औऱ बिना अंजाम की दौड में होड लगी है।
यह 50वाँ अर्थ डे है। मगर आज यह साबित हो गया है की मनुष्य अपनी टाँग न अडाए तो कुछ अनर्थ नहीं होगा अपितु धरती भी समय-समय पर समस्त जीव-जंतुओं के लिए आपदा पैदा करती रहेगी।

Disclaimer (अस्वीकरण)- इस आलेख में प्रस्तुत किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना, संपूर्णता, सटीकता और सत्यता के लिए talk2india उत्तरदायी नहीं है।